💥तकदीर की सियासत मे दिग्गज नेताओ को पीछे छोड़ा गोविंद डोटासरा ने
बिंदास बोल @ (सत्य पारीक) जयपुर : सियासत के गढ़ सीकर में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा की तकदीर को देखकर किसी भी राजनेता को ईर्ष्या हो सकती है। होना स्वाभाविक भी है,आखिरकार दो दशक की सियासत में डोटासरा ऐसी जगह पहुंच गए जहां वर्षों से राजनीति कर रहे नेता तो सपने ही देख रहे हैं । दरअसल डोटासरा की सियासत की छोटी पारी जिले के दिग्गज नेताओं की लंबी पारियों पर भारी पड़ गई है।
💥शेखावाटी जनपद का प्रमुख जिला सीकर जाट राजनीति के लिए देशभर में विख्यात है। इस जिले ने एक से एक जाट नेता पैदा करने के साथ-साथ देश के कई दिग्गज जाट नेताओं की डूबती नैया को यहां से पार लगाया है। आजादी के बाद से लोकतांत्रिक व्यवस्था में लंबे समय तक महरिया कुनबे राजनीति का डंका बजता रहा। स्व.रामदेव सिंह महरिया ने लंबे समय तक सीकर की सियासत को अपने इर्द-गिर्द समेटे रखा। उनके परिवार की सियासत को उखाड़ फेंकना किसी के बस की बात नहीं रही। हालांकि इसके लिए प्रयास बहुत होते रहे, लेकिन सफलता किसी को नहीं मिली। पंजाब में आतंकवाद का बोलबाला होने पर 1984 में उस समय के लोकसभा अध्यक्ष डॉ. बलराम जाखड़ सीकर लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने आए। यह वह वक्त था जब महरिया राजनीति पूरे परवान पर थी और इसको भेदने के लिए चौधरी नारायण सिंह उतावले थे परंतु सारे जतन करने के बावजूद महरिया सियासत को पार पाना आसान नहीं था। डॉ. जाखड़ देश के कद्दावर नेता थे। उनके आभामंडल के सामने महरिया भी फीके पड़ गए। इसी अवसर का लाभ लेकर चौधरी नारायण सिंह धीरे-धीरे मजबूत हुए और वे शिवचरण माथुर सरकार में मंत्री बने। उसी दिन से इस जिले में कांग्रेस की सियासत में दो चौधरी आमने-सामने हुए। लंबी उठापटक के बाद चौधरी नारायण सिंह की सियासत चमकी और वे प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष बन गए। अभी महरिया कुनबे की राजनीति का सूर्य अस्त होने ही वाला था कि उन्हीं के परिवार से सुभाष महरिया ने भाजपा में प्रवेश कर ऐसा रंग जमाया कि चौधरी की जमी जमाई सियासत में रंग में भंग पड़ गया। चौधरी नारायण सिंह प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद पर रहते हुए सुभाष महरिया से सांसद का चुनाव हार गए। इतना ही नहीं अगले चुनाव में महरिया ने डॉ.जाखड़ को भी मैदान में परास्त कर दिया। जिसका इनाम भाजपा ने उनको अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में केंद्रीय मंत्री के रूप में दिया। यह ऐसा समय था जब कांग्रेस के जाट नेता चारों खाने चित हो गए और भाजपा में सुभाष महरिया एक नई ताकत के रूप में जाटों के नेता बने।
💥इसी बीच किसान-मजदूर की राजनीति को मुद्दा बनाकर माकपा से अमराराम भी जाट नेता के रूप में मुखर हुए लेकिन उनकी कुछ सीमाएं थी। प्रदेश में एकमात्र माकपा से निर्वाचित होने वाले विधायक थे। जिनकी मौजूदगी सड़क पर तो बड़ी तगड़ी रही लेकिन सियासत के मैदान पर वे संघर्षशील नेता के रूप में ही नजर आए।
💥मजे की बात है आज आज चौधरी नारायण सिंह, सुभाष महरिया और अमराराम सियासत में मौजूद है परंतु हाशिए पर चले गए हैं। इन सबके बीच डोटासरा कम समय में ही लगातार तीन विधानसभा चुनाव जीतकर कांग्रेस और जाट बिरादरी के प्रमुख नेता बनकर एक चमकता हुआ सियासत का नया नक्षत्र बन गये है।
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