💥राजस्थान मे पिछले 9 महीने में हाशिये पर जीने वाले लोगों की भूख व पोषण की स्थिति बदतर, अध्ययन के निष्कर्ष
बिंदास बोल @ राजस्थान : रोजी रोटी अधिकार अभियान द्वारा zoom पर आयोजित, जन सूनवाई में जुडे 17 जिलों के लोगों ने प्रस्ताव पारित किया की सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के तहत सभी को 10 किलोग्राम अनाज, 1.5 क्रि.ग्रा. दाल और 200 ग्राम तेल बिना शर्त दिये जाए। आँगनवाडी केंद्र सुरक्षा ध्यान में रखते हुए खोले जाए। मनरेगा के तहत कार्य 150 दिन तक बढ़ाने और शहरी रोजगार गांरटी योजना शुरू करने की हुई मांग। साथ ही राशन व खाद्य सुरक्षा के सभी योजनां को आधार (UID) से अलग रख़ा जाये, सामाजिक अंकेक्षण खाद्य सुरक्षा कानून की सभी योजनाएं, PDS, ICDS और मध्यान्ह भोजन में होना चाहिए। खाद्य विभाग के साथ सिविल सोसाइटी के साथ हर महीने संवाद का कार्यक्रम शासन सचिव के नेतृत्व में होना चाहिए। जन सुनवाई में भूख की स्तिथि पर निकलकर आये चोकाने वाले आंकड़े । रोटी रोटी अधिकार अभियान द्वारा देश के 11 राज्यों में खाद्य सुरक्षा की स्थिति पर किये गये सर्वेक्षण के राजस्थान संबंधित परिणामों को 17 दिसम्बर को जारी किया गया।
💥सर्वेक्षण में राज्य में हाशिये पर जीवन बसर करने वाले समुहों जैसे दलित, आदिवासी, सफाई कर्मचारी, एकल औरतें, transgender, बुज़ुर्ग, मुस्लिम, निर्माण मजदूर व शहरों में बेघर आदि परिवारों में किया गया। सर्वे से निकले महत्वपूर्ण बिंदु
💥लॉकडाउन में गिरी आय और आजिविका के साधनों की समाप्ति ने भुख और खाद्य असुरक्षा को बढ़ावा दिया है।
💥सर्वेक्षण के आंकड़ो के अनुसार 51 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि अप्रैल-मई में उनकी कोई आय नहीं थी जबकि 26 प्रतिशत उत्तर दाताओं ने कहा कि सितम्बर-अक्टुबर में भी उनकी कोई आय नहीं थी। जबकि 67 प्रतिशत परिवारों की आय सितंबर-अक्टुबर में भी लॉकडाउन से पहले के मुकाबले कम है।
💥 जहां तक खाद्य सुरक्षा की बात है तो तीन चौथाई उत्तरदाताओं ने कहा कि उनका गेंहू, चावल और दाल का उपभोग कम हुआ है जबकि 84 प्रतिशत का सब्जी का उपभोग कम हुआ।
💥80 प्रतिशत उत्तरदाताओं मानना है कि उनकों पोषण का स्तर कम हुआ है और कुल मिलाकर खाने की मात्रा भी कम हुई है।
💥यही नहीं 44 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि उन्हें कभी-कभी भुखे सोना पड़ता है जबकि 9 प्रतिशत ने कहा कि उन्हें अक्सर भुखे सोना पड़ता है। लॉकडाउन से पहले 22 प्रतिशत परिवारों को कभी कभी भुखे रहना पड़ा।
💥कम हुई आय और भुख की स्थिति ने 62 प्रतिशत उत्तरदाताओं को खाने के लिये कर्ज लेने को मजबूर होना पड़ा।
💥हालांकि सभी क्षेत्रों में स्थिति बहुत खराब हुई है कोटा शहर के सभी उत्तरदाओं ने खाने की मात्रा और पोषण की में कमी आई है और 90 प्रतिशत उत्तरदाओं ने कहा कि उन्हें भुखे सोना पड़ता है।
💥 जयपुर शहर के बेघर और कच्ची बस्ती के उत्तरदाताओं जिनमें अधिकतर पलायन करके आये मजदूर हैं, की स्थिति भी काफी खराब है।
💥हालांकि अध्ययन में शामिल 66 प्रतिशत उत्तरदाताओं के पास राशन कार्ड है (कोटा में 95 प्रतिशत के पास राशन कार्ड है) लेकिन फिर भी लॉक डाउन के दौरान केवल 44 प्रतिशत उत्तरदाताओं को हर महिने और 23 प्रतिशत को कुछ महिनों में मुफ्त अनाज मिला। 💥जबकि मुफ्त दाल भी 40 प्रतिशत को मिली और अन्य 25 प्रतिशत को कुछ महिने में मिला।
💥इस मामले में भी कोटा की स्थिति बहुत बूरी रही वहां केवल 6 प्रतिशत को अनाज मिला और दाल किसी को नही मिली।
💥जहां तक मध्यान्ह भोजन और आंगनबाड़ी में पोषाहार का सवाल है, केवल 19 प्रतिशत स्कूली बच्चों को मध्यान्ह भोजन (या आनाज) और 13 प्रतिशत को पोषाहार मिल पाया।
🔶️अध्ययन से पता चलता है कि राज्य में हाशिये के लोगों में खाद्य सुरक्षा की स्थिति दयनीय है। जन सुनवाई मे कोटा जिले से एकल नारी शक्ति संगठन की चन्द्रकला ने बताया कि शहर में काफी ऐसे लोग हैं जिनके नाम एन एफ एस ए में शामिल होने की अपील स्वीकार होने पर भी नाम नहीं जोड़े जा रहे हैं I जयपुर से सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज की कोमल ने बताया कि जिन लोगों का नाम अस्थाई रूप से जोड़ा गया उन्हें भी केवल एक या दो बार ही अनाज मिला। कुपोषण औरतों में बहुत था १२ महीने पहले किये गए सुर्वे मिएँ महिलाओं में खून की कमी ज़बरदस्त थी, 4 से 8 तक भी औरतों के हीमोग्लोबिन आया था । जयपुर से ही निर्माण व जनरल वर्कर्स यूनियन के हरकेश बुगालिया ने बताया की 1000 नाम खाद्य सुरक्षा बढ़ाने के बावजूद एक भी प्रवासी को राशन नहीं मिला और घरेलु कामगार यूनियन की रमा चौधरी ने बताया की किसी को कोई राशन नहीं मिला और कामगार महिलाओं को भेदभाव पूर्ण बिहारी, बंगाली उलहना सहना पड़ा। नागौर से धन्ना राम ने PPT के जरिया बताया कैसे इंट भट्टे मजदूरों को कुछ भी नहीं मिला, न जो प्रवासी लौटे, बीकनेर के चेतन राम ने बताया की भूख घुमंतू और कचरा बिन्नी वालों में है , शहर और कसबे में। अलवर के राम तरुण ने बताया की किशनगढ़ बॉस की वाल्मीकि समाज की महिलाए भूख से त्रस्त है, न खेती में उपज, न राशन में अनाज, न स्कूल में अब सफाई के काम के लिए बुलाया जा रहा है। अजमेर के महिला जन अधिकार समूह के छोटू लाल ने बताया की घुमंतू परिवारों को लॉक डाउन में भी बेदखल किय जा रहा है और झूले वाले, शादी में सर्विस, लाइट्स आदि के काम बंद होने से वे कुछ भी कमा नहीं पा रहे हैं, सरकारी राशन तो दूर। बाडमेर की अनीता ने पीने के पानी की बात रखी। उदयपुर के मोहम्मद याकूब ने बताया की अधिकांश hawkers के पास राशन कार्ड नहीं है और है तो NFSA से नहीं जुड़े हैं और उनके जीवन यापन के साधन बर्बाद हो चुके हैं, क्योंकि बाज़ार चल नहीं रहे हैं और पुलिस COVID guidelines के नाम पर सड़क पर व्यापार नहीं करें दे रही है। डूंगरपुर की वागड़ मज़दूर ओर संगठन की मधुलिका ने बताया की आदिवासी महिलाओं की खेती बहुत कम है और राशन उपलब्ध नहीं है। मजदूर किसान शक्ति संगठन के विनीत ने बताया की बुज़ुर्ग लोगों में भूखमरी है और लोगों को जो 5 किलो अतिरिक्त राशन के ही कारन जी पाए हैं। उसे मिलते रहना चाहिए, साथ ही दाल और तेल भी मिलना चाहिए। जन सूनवाई में राजस्थान में खाद्य सूरक्षा कानून में नये नाम जोड़ने की प्रक्रिया आरंभ करने और इस वर्ष के गिरदावरी की रिर्पोट जारी किया जाये, की मांग की गई। जन सुनवाई में राजस्थान सरकार के खाद्य विभाग के सहायक निदेशक, विकास ने कहा की राजस्थान में 4.66 करोड़ लोगों को केंद्र लाभार्थी मानती है जबकि राज्य सरकार 4.78 करोड़ लोगों को अनाज बाँट रही है I ये 2011 के जनगणना के आंकड़े के आधार पर दिए जा रहे है, जबकि 2020 भी खत्म होने को आ गएI उन्होंने कहा की आत्मनिर्भर भारत के तहत 4.18 लाख लोगों को राशन दिया है । सभी का मानना था की यह भी बहुत प्रवासी मजदूरों तक पहुँचाया गया।
💥जन सुनवाई के विशेष वक्ता MKSS के निखिल डे ने स्पष्ट कहा की 7 साल गुज़र जाने पर भी सोशल ऑडिट की प्रक्रिया NFSA में अनिवार्य प्रावधान होते हुए भी नहीं की गयी । जबकि मध्याह्ं भोजन और ICDS का राशन, से शुरूवात करना चाहिए क्यूंकि कुपोषण भी बच्चों मे बाधा है। आधार की शर्त हटानी चाहिए और आधार नहीं होने के नाम पर नाम काटे जा रहे हैं, फर्जी नामों के तहत. तो यह नहीं किया जाये व नए नाम जोड़े जाएँ पोर्टल को खोला जाये । उन्होंने कहा की कृषि कानून गेहूं के उठाव को खत्म करता और इससे PDS भी खतम होगा, इसलिए कानून का विरोध करना चाहिए । जन सुनवाई का समन्वयन कविता श्रीवास्तव व कमल टांक ने किया ।
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